मनसा परिक्रमा मन्त्रों के कतिपय शब्दों के अर्थ || Meaning of certain words of Mansa Parikrama mantras

मनसा परिक्रमा मन्त्रों के कतिपय शब्दों के अर्थ

—————————

Meaning of certain words of Mansa Parikrama mantras, six
Mansa Parikrama mantras

• छः दिशाएं

प्राची दिक् – पूर्व अथवा सामने की दिशा
दक्षिणा दिक् – दक्षिण अथवा दाईं दिशा
प्रतीची दिक् – पश्चिम अथवा पीछे की दिशा
उदीची दिक् – उत्तर अथवा बाईं दिशा
ध्रुवा दिक् – नीचे की दिशा
ऊर्ध्वा दिक् – ऊपर की दिशा

• छः दिशाओं के छः अधिपति: अर्थात् स्वामी 

प्राची – अग्नि: = ज्ञानस्वरूप ईश्वर
दक्षिणा – इन्द्र: = परमेश्वर्ययुक्त ईश्वर
प्रतीची – वरुण: = सर्वोत्तम ईश्वर
उदीची – सोम: = शान्ति प्रदाता ईश्वर
ध्रुवा – विष्णु: = सर्वव्यापक ईश्वर
ऊर्ध्वा – बृहस्पति: = वेदशास्त्र तथा ब्रह्मांड का पति ईश्वर

• छः दिशाओं के छः रक्षितृ 

प्राची – असित: = बन्धन रहित
दक्षिणा – तिरश्चिराजी = कीट-पतंग, वृश्चिक आदि तिर्यक् की राजी = पंक्ति
प्रतीची – पृदाकू = अजगर आदि विषधर प्राणी
उदीची – स्वज: = अजन्मा
ध्रुवा – कल्माषग्रीव: = वृक्ष आदि
ऊर्ध्वा – श्वित्र: = शुद्ध स्वरूप

• छः दिशाओं के छः इषव: = बाण के समान 

प्राची – आदित्या: = प्राण, सूर्य की किरणें
दक्षिणा – पितर: = ज्ञानी लोग
प्रतीची – अन्नम् = अन्नादि भोग्य पदार्थ
उदीची – अशनि: = विद्युत्
ध्रुवा –  वीरुध = लता, बेल आदि
ऊर्ध्वा – वर्षम् =वर्षा के बिन्दु

• नम: = नमस्कार !

1. तेभ्य: = उनके (ईश्वर के सब गुणों के) लिए नम: = नमस्कार

2. अधिपतिभ्य: = उन सब गुणों के अधिपति =  स्वामी के गुणों के लिए नम: = नमस्कार !

3. रक्षितृभ्य: = रक्षक गुणों के लिए या रक्षक पदार्थों के लिए नम: = नमस्कार !

4. इषुभ्य: = दुष्टों की ताड़ना और श्रेष्ठों की रक्षा के निमित्त प्रभु के बाणरूप आदि साधनों के लिए नम: = नमस्कार !

यह भी पढ़े 👇

योगदर्शन में पांच प्रकार के क्लेश || Five types of tribulations in Yogadarshan

जीवन निर्माण में गुरु की भूमिका || Role of Guru in building life

Leave a Reply

Your email address will not be published.