महर्षि दयानन्द जी की दृष्टि में “यज्ञ” || “Yagya” in the eyes of Maharishi Dayanand ji


महर्षि दयानन्द जी की दृष्टि में “यज्ञ”



लेखक- वैदिक गवेषक आचार्य शिवपूजनसिंहजी कुशवाहा ‘पथिक’, विद्यावाचस्पति, साहित्यालंकार, सिद्धान्तवाचस्पति
       [पश्चिमी विद्वानों के द्वारा वेदों का अनर्थ करने के बाद यदि किसी ने वेद के मन्त्रार्थ को बिगाड़कर अध्यात्म-ज्ञान की हिंसा का श्रेय प्राप्त करना चाहा तो उसमें पौराणिक जगत् सदैव अग्रणी रहा है। वेदों के सत्यार्थ को जन-सामान्य में पुन: प्रतिष्ठित करके शास्त्रार्थ-परम्परा का उदय आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द ने किया। आर्यजगत् की शास्त्रार्थ परम्परा ने धर्म से भटके हुए न जाने कितने मनुष्यों को वेदों से परिचित कराकर सभी पर उपकार किया है। जिस समय हिन्दू समाज में स्वपक्ष का पोषण करने वाले पोपमण्डल ने अष्टादशपुराणों की निराधार मान्यताओं को चारों ओर फैलाया था, उस समय आर्यजगत् के दिग्गज विद्वानों ने इनके आधारहीन स्तम्भों को उजाड़कर रख दिया था। उन विद्वानों में आचार्य शिवपूजनसिंहजी कुशवाहा की भूमिका अतुलनीय रही है। पौराणिक जगत् के विद्वान् यज्ञ शब्द से केवल ‘अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त श्रौत कर्मों’ का ही ग्रहण करते हैं, जबकि वेदों के पुनरुद्धारक स्वामी दयानन्दजी महाराज अपने वेदभाष्य में यज्ञ शब्द का अर्थ ‘अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त श्रौत कर्म’ के अतिरिक्त ‘अनेक शुभ कर्मों’ का भी ग्रहण करते हैं। ‘यज्ञ’ शब्द ‘यज्ञ देवपूजासंगतिकरणदानेषु’ (धातुपाठ १/७२८) इस धातु से ‘यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ्’ (अष्टाध्यायी ३/३/९०) इस पाणिनीय वचनानुसार भाव में ‘नङ् (न)’ प्रत्यय होकर बनता है। ‘यज’ धातु के देवपूजा, संगतिकरण और दान ये तीन अर्थ हैं। इस ऐतिहासिक लेख में आर्यजगत् के अद्वितीय विद्वान् शास्त्रार्थ महारथी आचार्य शिवपूजनसिंह कुशवाहा जी ने पौराणिक जगत् की यज्ञ सम्बन्धी भ्रान्ति का निवारण किया है, जो ‘वेदवाणी’ (मासिक) के फरवरी १९५४ के अंक में प्रकाशित हुआ था। लेख में एकाध स्थल पर हुई अशुद्धियों को शोध करके यह लेख पाठकों के लाभार्थ उपलब्ध कराया जा रहा है। 

           वेदों पर श्री स्कन्दस्वामी उद्गीथ वेंकटमाधव, आत्मानन्द, देवस्वामी, मुद्गल, हरिस्वामी, आनन्दबोध, देवयाज्ञिक, देवपाल, भवस्वामी, भट्ट भास्कर, भरत स्वामी आदि आचार्यों के भाष्य हस्तलेख रूप में प्राप्त हैं। श्री सायण, उव्वट, महीधर ने भी वेदभाष्य किए, परन्तु ये रूढ़िवाद में पड़कर वेदों के वास्तविक अर्थ से दूर रहे। इन्होंने वेदों के अश्लील तथा दूषित अर्थ किए। अश्व महिषी संगम, गोमांस आदि खाने तक के सम्पूर्ण वाममार्ग के सिद्धान्तों को प्रदर्शित किया जिससे वेदों की महिमा जाती रही।

यज्ञ
यज्ञ:


          वेदभाष्यकारों के विषय में वैदिक गवेषक श्री पं० भगवद्दत्तजी देहली ने भी विस्तृत विवेचन किया है। आर्यसमाज के संस्थापक योगिराज महर्षि दयानन्दजी महाराज ने भी अपनी लेखनी उठाकर वेदार्थ में क्रान्ति उत्पन्न कर दी। आपने वेदों को प्रभु की वाणी, नित्य और स्वतःप्रमाण कहा है और अपने ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’, ‘सत्यार्थप्रकाश’ आदि ग्रन्थों में भी लिखा है। आपका अर्थ त्रिविध प्रक्रिया के अनुसार है जिस प्रक्रिया को श्री स्कन्दस्वामी ने भी अपने निरुक्त भाष्य में स्पष्ट स्वीकार किया है। इनके भाष्य की प्रशंसा बड़े-बड़े दिग्गज विद्वानों ने मुक्त कण्ठ से की है। इसका पूर्ण विवेचन हमने अपने ग्रन्थ ‘महर्षि दयानन्दजी कृत वेदभाष्यानुशीलन’ में किया है जो पाठकों को अवश्य देखना चाहिए।

आधुनिक काल के योगिराज परलोकवासी श्री अरविन्द घोष जी ने स्पष्ट लिखा है-
          महर्षि दयानन्द जी की इस धारणा में कि वेद धर्म और पदार्थ विद्या के भंडार हैं, कोई अयुक्त वा अनहोनी बात नहीं है। मैं उनकी उत्तम धारण में अपना विश्वास और जोड़ना चाहता हूं कि वेदों में पदार्थ विद्या की अन्य ऐसी सच्चाइयां भी हैं जिनको आजकल का संसार यत्किंचित् भी नहीं जान पाया है। एक बार वेदों की स्थिति स्वामी दयानन्द के अभिमतानुसार समासीन हो जाने दो तो फिर देखोगे कि सायणाचार्य का केवल रूढ़िपरक और कपोल-कल्पित अनेक ईश्वरवाद पर आश्रित वेदों के भाष्य का भवन अपने आप गिर जाएगा और उसी के साथ-साथ पाश्चात्य विद्वानों का केवल भौतिक पदार्थ और प्राकृतिक पूजनपरक भाष्य भी धराशायी हो जाएगा और वेद एक उच्च तथा गौरवास्पद ईश्वरीय ज्ञान पुस्तक के रूप में हमारे पास शोभनीय होगा।”

        ‘यज्ञ’ शब्द के विषय में बड़ा मतभेद है। कुछ विद्वान् ‘यज्ञ’ शब्द से केवल ‘अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त श्रौर कर्मों’ का ही ग्रहण करते हैं। काशी के पौराणिक पण्डित वेणीराम शर्मा गौड़, वेदाचार्य, काव्यतीर्थ ने ‘यज्ञ-मीमांसा’ नामक एक उत्तम पुस्तक लिखी है पर पौराणिक दृष्टिकोण से लि खी जाने के कारण हम पूर्णतः सहमत नहीं हैं।

        ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘यज्, देवपूजा, संगतिकरण, दानेषु’ इस धात्वर्थ के आधार पर है। महर्षि दयानन्द जी महाराज अपने वेदभाष्य में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त श्रौत कर्म’ के अतिरिक्त ‘अनेक शुभ कर्मों’ का ग्रहण करते हैं। वैदिक और प्राचीन साहित्य में ‘यज्ञ’ शब्द का ऐसे ही व्यापक अर्थ में प्रयोग है और प्रत्येक श्रेष्ठ कर्म का उसमें अन्तर्भाव हो सकता है।
 यथा-
अध्वरो वै यज्ञ: (शतपथ ब्रा० १/२/४/५, १/४/१/३८), यज्ञो वै नम: (शतपथ ब्रा० ७/४/१/३०), यज्ञो वै भुज्यु: (यजुर्वेद अ० १८ मं० ४२), यज्ञो हि सर्वाणि भूतानि भुनक्ति (शतपथ ब्रा० ९/४/१/११), यज्ञो भग: (शतपथ ब्रा० ६/३/१/१९), यज्ञो ह वै मधु सारघम् (शतपथ ब्रा० ३/४/३/१४), यज्ञो वै स्व: (यजु० १/११), यज्ञो वै सुम्नम् (शतपथ ब्रा० ७/२/२/४), यज्ञो वै विशो यज्ञे हि सर्वाणि भूतानि विष्टानि (शतपथ ब्रा० ८/७/३/२१), ब्रह्म हि यज्ञ: (शतपथ ब्रा० ५/३/२/४), यज्ञो वै भुवनज्येष्ठ: (कौ० ब्रा० २५/११), यज्ञो वै भुवनस्य नाभि: (तैत्तिरीय ब्रा० ३/९/५/५), रेतो वाऽ अत्र यज्ञ: (शतपथ ब्रा० ७/३/२/९), यज्ञो वा अवति (ताण्ड्य० ब्रा० ६/४/५), ऋतुसंधिषु वै व्याधिर्जायते (गोपथ ब्रा० उ० १/१९, कौ० ब्रा० ५/१), आत्मा वै यज्ञ: (शतपथ ब्रा० ६/२/१/७), स्वर्गो वै लोको यज्ञ: (कौ० १४/१), यज्ञो विकंकत: (शतपथ ब्रा० १४/१/२/५), यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म (शतपथ ब्रा० १/७/१/५), यज्ञो हि श्रेष्ठतमं कर्म (तैत्तिरीय० ब्रा० ३/२/१/४), यज्ञो वै महिमा (शतपथ ब्रा० ६/३/१/१८), पुरुषो वै यज्ञ: (कौषीतकी ब्रा० १७/७), यज्ञो वै भुवनम् (तै० ३/३/७/५), यज्ञो वा ऽऋतस्य योनि: (शतपथ ब्रा० १/३/४/१६)।
इन वचनों से महर्षि के अर्थों की पुष्टि होती है। इन वाक्यों में लोकोपकारक सब श्रेष्ठ कर्मों को यज्ञ नाम से कहा गया है।


अब महर्षि दयानन्दजी महाराज के वेदभाष्य से कतिपय उदाहरण दिये जाते हैं-
(१) यजुर्वेद अ० १ मन्त्र २१ के भावार्थ में ‘विद्वत्सङ्ग विद्योन्नितिर्होमशिल्पाख्यैर्यज्ञैर्वायुवृष्टिजलशुद्धयश्च सदैव कार्य्या इति’ – विद्वानों का सङ्ग तथा विद्या की उन्नति से वा होम शिल्प कार्यरूपी यज्ञों से वायु और वर्षा जल की शुद्धि सदा करनी चाहिए।

(२) यजु० अ० ५ मन्त्र २ में ‘उर्वशी’ शब्द का यौगिक अर्थ करते हैं- ‘ययोरूणि बहूनि सुखान्यश्नुवते सा यज्ञक्रिया’ – बहुत सुखों को प्राप्त करानेवाली यज्ञ क्रिया है।
पौराणिक भाष्यकार यहां ‘उर्वशी’ से ‘अप्सरा’ का ग्रहण करते हैं जो भ्रममात्र है।
देखिए ऋग्वेद ७/३३/१० में ‘उर्वशी’ को ‘विद्युतोज्योति:’ – ‘विद्युत की ज्योति’ कहा है। ऋग्वेद १०/९५/१७ में ‘उर्वशी’ को वाणी कहा है।
निरुक्तसमुच्चय (४/१४) में ‘उर्वशी’ को ‘विद्युत’ बतलाया है। ‘विद्युत उर्वशी’ इति दुर्गाचार्य: (निरुक्तभाष्य ५/१४)
महीधर ने यजु० ५/२ का अश्लील अर्थ करते हुए लिखा है- ‘यथोर्वशी पुरूरवोनृपस्य भोगायाधस्ताच्छेते…’ अर्थात् ‘जैसे उर्वशी, पुरुरवा राजा के भोग के लिए नीचे सोती है।
इनका अर्थ सर्वथा ही त्याज्य है क्योंकि महीधर वाममार्गी थे।

(३) यजु० अ० ५ मन्त्र ३ में यज्ञ शब्द का अर्थ- ‘अध्ययनाध्यापनाख्यं कर्म’ – पढ़ने-पढ़ाने रूप यज्ञ।
राजर्षि मनु जी ने भी लिखा है- ‘अध्यापनं ब्रह्मयज्ञ:’ (मनुस्मृति ३/७०)। इसकी व्याख्या करते हुए श्री कुल्लूक भट्ट लिखते हैं- ‘अध्यापनशब्देनाध्य्यनमपि गृह्यते जपोऽहुत: इति वक्ष्यमाणत्वात्। अतोऽध्यापनमध्ययनं च ब्रह्मयज्ञ:।’
इससे महर्षि दयानन्द जी कृत – ‘अध्ययनाध्यापनरूप’ अर्थ का स्पष्ट समर्थन होता है।

(४) यजु० ७/३५ में ‘सोमं’ शब्द का अर्थ- ‘सकलगुणैश्वर्य्यकल्याणकर्माध्य्यनाध्यापनाख्यं यज्ञम्’ – समस्त अच्छे गुण, ऐश्वर्य और सुख करने वाले पठनपाठन-रूपी यज्ञ को।
इसी प्रकार इसी मन्त्र में ‘सुयज्ञा:’ शब्द का अर्थ- ‘शोभनोऽध्य्यनाध्यापनाख्यो यज्ञो येषां त इव’ – ‘अच्छे पढ़ने-पढ़ाने वाले विद्वानों के समान।’

(५) यजु० ११/७ में तथा ९/१ में ‘यज्ञं’- ‘सर्वेषां सुखजनकं राजधर्मम्’ – ‘सब को सुख देने वाले राजधर्म का’ (यजु० ९/१ में)। और ‘यज्ञम्’- ‘सुखानां सङ्गमकं व्यवहारम्’ – ‘सुखों के प्राप्त कराने हारे व्यवहार वह सब यज्ञ है’ (यजु० ११/७ में)।

(६) यजु० अ० ११ मन्त्र ८ में ‘यज्ञम्’ – ‘विद्या और धर्म का संयोग कराने हारे यज्ञ को।’

(७) यजु० अ० १८ मन्त्र १६ में  ‘यज्ञेन’- ‘विद्यैश्वर्य्योन्नतिकरणेन’ – ‘यज्ञ उस साधन को कहते हैं, जिससे विद्या और ऐश्वर्य की उन्नति हो।’

(८) यजु० अ० १८ मन्त्र ९ में ‘यज्ञेन’- ‘सर्वरसपदार्थवर्द्धकेन कर्मणा’ – ‘यज्ञ उस कर्म को कहते हैं जो सर्व रसों और पदार्थों को बढ़ावे।’

(९) यजु० अ० १८ मन्त्र २६ में ‘यज्ञेन’- ‘पशुपालनविधिना’ – ‘जिस विधि से पशुपालन हो उस विधि का नाम यज्ञ है।’

(१०) यजु० अ० १८ मन्त्र २७ ‘यज्ञेन’- ‘पशुशिक्षाख्येन’ – ‘पशु शिक्षा भी यज्ञ है।’

(११) यजु० अ० १८ मन्त्र ६२ में ‘यज्ञम्’- ‘अध्ययनाध्यापनाख्यम्’ – अध्ययनाध्यापन कर्म का नाम यज्ञ है।

(१२) यजु० अ० २२ मन्त्र ३३ में ‘यज्ञ’ शब्द बहुत बार आया है। इस मन्त्र में ‘यज्ञ’ शब्द से अनेक अर्थों का ग्रहण किया है। विद्यादान को भी यज्ञ कहा है। योगाभ्यास आदि कर्म भी यज्ञ है। श्रेष्ठ काम वा उत्तम काम यज्ञ है। यज्ञ का अर्थ यज्ञादि सत्कर्म करके प्रकट किया है कि जिन कर्मों को यज्ञ शब्द से ही प्रकट कर सकते हैं, उनसे अतिरिक्त कर्मों का ग्रहण भी ‘यज्ञ’ शब्द से करना युक्त है।
व्यापक परमात्मा और जीवात्मा दोनों यज्ञ हैं।

(१३) यजु० अ० २३ मन्त्र ५७ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘जगत् वा संसार’ किया है।

(१४) यजु० अ० २३ मन्त्र ६२ में ‘यज्ञ’ शब्द से ‘जगदीश्वर’ अर्थ किया है।

(१५) यजु० अ० २५ मन्त्र २७ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘सत्कार’ किया है।

(१६) यजु० अ० २५ मन्त्र २८ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘संगत’ किया है।

(१७) यजु० अ० २५ मन्त्र ४६ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘विद्वानों के सत्कार आदि उत्तम काम’ किया है।

(१८) यजु० अ० २६ मन्त्र १९ में ‘यज्ञम्’ का अर्थ ‘धर्म्ये व्यवहारम्’ – ‘धर्मयुक्त व्यवहार’ ऐसा किया है।

(१९) यजु० अ० २६ मन्त्र २१ में ‘यज्ञम्’ का अर्थ ‘प्रशस्तव्यवहारम्’ – ‘उत्तम व्यवहार’ किया है।

(२०) यजु० अ० २७ मन्त्र १३ में ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘सङ्गत व्यवहार’ किया है।

(२१) यजु० अ० २७ मन्त्र २६ में ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘सङ्गत संसार’ किया है।

(२२) यजु० अ० २९ मन्त्र ३६ में ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘अनेकविधव्यवहारम्’ ऐसा किया है।

(२३) यजु० अ० ३० मन्त्र १ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ- ‘राजधर्माख्यम्’ – अर्थात् ‘राजधर्मरूप यज्ञ को’ ऐसा किया है।

(२४) यजुर्वेद अध्याय ३७ मन्त्र ८ में ‘मखस्य’ शब्द का अर्थ ‘ब्रह्मचर्य्य आश्रम रूप यज्ञ के’ किया है। इस अर्थ में ‘ब्रह्मचर्य आश्रम’ को यज्ञ कहा है।

(२५) यजु० अ० ३१ मन्त्र ७ में ‘यज्ञ’ का अर्थ – ‘पूजनीयतम’ किया है।

(२६) यजु० अ० ३१ मन्त्र १४ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘मानसज्ञान यज्ञ’ किया है।

(२७) यजु० अ० ३१ मन्त्र १६ में ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘ज्ञानयज्ञ से पूजनीय सर्वरक्षक अग्निवत् तेजस्वि ईश्वर’ किया है।

(२८) यजु० अ० ३३ मन्त्र ३३ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘यात्रा संग्राम वा हवनरूप यज्ञ’ लिखा है।

(२९) यजु० अ० ३४ मन्त्र २ में ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘अग्निहोत्रादि वा धर्मसंयुक्त व्यवहार वा योग यज्ञ’ ऐसा किया है।

(३०) यजु० अ० ३४ मन्त्र ४ में ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘अग्निष्टोमादि वा विज्ञानरूप व्यवहार’ ऐसा किया है।

(३१) यजु० अ० ३८ मन्त्र ११ में ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘विद्वानों के सङ्ग’ किया है।

(३२) ऋग्वेद मण्डल १ सूक्त ३ मन्त्र १० में ‘यज्ञम्’ का अर्थ- ‘शिल्पिविद्यामहिमानं कर्म च’ – ‘शिल्प विद्या की महिमा और कर्मरूप यज्ञ को।’

(३३) ऋ० १/४/७ में ‘यज्ञश्रियम्’ की व्याख्या करते हुए ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘महिमा’ किया है। इस प्रकार ‘यज्ञश्रियम्’ का अर्थ लिखा है ‘चक्रवर्त्ती राज्य की महिमा की शोभा को।’
‘राष्ट्रं वा अश्वमेध:’ इस ‘शतपथ ब्राह्मण’ के प्रमाण से महर्षि दयानन्दजी कहते हैं कि ‘यज्ञ’ शब्द से ‘राष्ट्र’ का ग्रहण किया जाता है। यहां भी ‘यज्ञो वै महिमा’ शतपथ का प्रमाण दिया है।
इस प्रकार राष्ट्र का संघटन करना वा राष्ट्रोन्नति के सहायक सब कर्म यज्ञ कहलाते हैं।

(३४) ऋग्वेद १/१०/४ में ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘क्रियाकौशलम्’ अर्थात् ‘होम ज्ञान और शिल्पविद्यारूप क्रिया’ किया है।

(३५) ऋग्वेद १/१२/१ में ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘शिल्पविद्या’ किया है।

(३६) ऋ० १/१५/७ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘अग्निहोत्र आदि अश्वमेधपर्य्यन्त यज्ञ वा शिल्पविद्यालय यज्ञ’ किया है।

(३७) ऋ० १/२०/२ में ‘यज्ञम्’ का अर्थ ‘पुरुषार्थसाध्यम्’ किया है। इस प्रकार “जो पुरुषार्थ साध्य है उस सबको महर्षि दयानन्दजी यज्ञ कहते हैं।”

(३८) ऋ० १/२१/२ में ‘यज्ञेषु’ का अर्थ- ‘पठनपाठनेषु शिल्पमयादिषु यज्ञेषु’ किया है। इससे स्पष्ट है, पठन-पाठन कार्य और शिल्पमयादि कार्य भी यज्ञ हैं।

(३९) ऋ० १/२२/३ में ‘यज्ञम्’ का अर्थ- ‘सुशिक्षोपदेशाख्यम्’ ऐसा कहा है। इससे स्पष्ट है कि श्रेष्ठ शिक्षा का नाम भी यज्ञ है।

(४०) ऋ० १/२७/१० में ‘यज्ञियाय’ का अर्थ- ‘यज्ञ कर्मार्हतीति यज्ञियो योद्धा तस्मै’ – ‘यज्ञकर्म के योग्य जो हो उसे यज्ञिय कहते हैं।’ ‘यज्ञिय’ शब्द से ‘योद्धा’ का ग्रहण करने से ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘युद्ध’ है ऐसा स्पष्ट होता है।

(४१) ऋ० १/४१/५ में ‘यज्ञम्’ का अर्थ- ‘शत्रुनाशकं श्रेष्ठपालनाख्यं राजव्यवहारम्’ किया है। शत्रु का नाश और श्रेष्ठ का पालन जिससे हो ऐसे राजव्यवहार को ‘यज्ञ’ कहा है।

(४२) ऋ० १/४४/३ में ‘यज्ञानाम्’- ‘अग्निहोत्राद्यश्वमेधान्तानां योगज्ञानशिल्पोपासनाज्ञानानां’ लिखा है।


आपने अपने ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ के ‘वेदविषय विचार’ में लिखा है- ‘अग्निहोत्रमारभ्याश्वमेधपर्यन्तेषु यज्ञेषु’ इससे कतिपय व्यक्ति यह समझते हैं कि अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त कर्मों का नाम ही ‘यज्ञ’ है।
परन्तु यह धारणा भ्रमपूर्ण है क्योंकि उनके भाष्य को पढ़ने से अन्यान्य अर्थ भी होते हैं जैसा कि ऊपर थोड़े स्स प्रदर्शित किए गए हैं। जितने श्रेष्ठ कर्म हैं सब आपकी दृष्टि में ‘यज्ञ’ है। अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त कर्म भी श्रेष्ठ कर्म है अतः ये कर्म भी यज्ञ हैं न कि ये कर्म यज्ञ हैं।
ऐसी विशाल अपूर्व व्याख्या अन्य किसी भाष्यकार ने नहीं की, महर्षि दयानन्दजी के इस कार्य से सभी आर्य ऋणी हैं क्योंकि उन्होंने अपनी १८ घण्टे की समाधि को त्याग कर यह महान कार्य किया।

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