Divya Jeevan – जीवन को दिव्य कैसे बनाये , दिव्य जीवन के आदर्श , दिव्य जीवन की साधना

 Divya Jeevan  

जीवन को दिव्य कैसे बनाये , दिव्य जीवन के आदर्श , दिव्य जीवन की साधना 


Divya Jeevan
Divya Jeevan

   ऊधरोहण मनुष्य की एकमात्र प्रबल अभीप्सा है । जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त मनुष्य सफलता की चाह , जीत के जुनून और कामयाबी की कामना में जीता है । अभ्युदय व निःश्रेयस की पूर्ण सिद्धि ही मानव धर्म है । यद्यपि सफलता का विजय के बाह्य व आंतरिक , व्यक्तिगत व सामाजिक , व्यवहारिक व पारमार्थिक अनेक घटक होते हैं । परंतु परम आवश्यक है मानवीय जीवन को एक दिव्य दर्शन युक्त प्रकाशित पथ की । समग्र व्यक्तित्व को निखारने के लिए कुशलताओं को बढ़ाने के लिए पूर्ण आनंद व परमानंद में अवस्थिति के लिए एक दिव्य दृष्टि किसी श्रेष्ठतम् पूर्ण समर्थ गुरु या महापुरुष के सान्निध्य में मिलती है और यह दिव्य सान्निध्य ही मानव को महामानव ( साधारण से विशेष ) बनाता है । जब मनुष्य को समर्थ गुरु के आलोकित जीवन की किरणें प्रकाशित करती हैं तो उसके जीवन में शुक्ल पक्ष का प्रारंभ होता है और वह ज्योतिर्मय हो जाता है ।


“वेद , शास्त्र , श्रेष्ठ गुरु एवं स्वधर्मपूर्वक विधि निषेध का 100 प्रतिशत श्रद्धा से पालन करना दिव्य जीवन का एक श्रेष्ठ संकल्प है ।”


     दिव्य दृष्टि पाकर मानव परम सत्य की अभिव्यक्ति सार्वभौमिक , सार्वकालिक सत्यों की प्रतिष्ठा के लिए सद्भावना पूर्ण भावों व मानसिक स्पष्टता से पूर्ण विवेकी होकर स्वयं के एवं समष्टि के कल्याण के लिए उन श्रेष्ठ नियमों व कर्तव्यों के पालन में पूर्ण पुरुषार्थ करता है । जो एक समग्र दृष्टि को उपलब्ध करवाने में समर्थ होते हैं । 


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दिव्य जीवन के आदर्श –

‘ इन्द्रं वर्धन्तो असुरः कण्वन्तो विश्वमार्यम् । अपघ्नन्तो अराव्णः । 

• सेल्फ रियलाइजेशन से कलेक्टिव रियलाइजेशन हमारा आदर्श है मैं मुक्त हो जाऊँ या केवल मैं वेद , योग , सेवा – साधना के मार्ग पर चलूँ , दूसरों से मुझे क्या ? इस प्रकार की स्वार्थपरता ( सेल्फ सेन्टर्डनेस ) हमारा आदर्श नहीं है ।

• स्वयं को जानना , जगाना व समस्त दिव्यतोओं व पूर्णता को पाना , ईश्वर प्रदत्त अनन्त दिव्य सात्त्विक सामर्थ्य का विकास व विस्तार स्वयं करना व कराना , वेद , योग , धर्म , सेवा , न्याय व श्रेष्ठ मार्ग पर स्वयं चलना व अन्यों को चलाना व अन्यों को भी श्रेष्ठ वरण के लिए प्रेरित करना , यही हमारे जीवन का आदर्श है ।

 • केवल ज्ञान , केवल भक्ति , केवल कर्म , केवल अध्यात्म , केवल अभ्युदय या केवल निःश्रेयस हमारा आदर्श व ध्येय नहीं है । 

• शुद्ध ज्ञान , शुद्ध कर्म , शुद्ध उपासना , सम्यक् मति , भक्ति , कृति व प्रकृति के समग्र सिद्धांत को मानना । ईश्वर के विश्वमय व विश्वातीत रूप का स्मरण रखते हुए निराकार ईश्वर की उपासना करना ही सर्वश्रेष्ठ है । 

• वैदिकपथ , श्रेयपथ , सत्यपथ पर आरुढ़ होकर भगवद्गीता के दैवी सम्पद् 26 गुणों अर्थात् दैवी सम्पद् के अनुरूप आचरण करना , एक बार भी आसुरी सम्पद का आचरण नहीं करना । 

• सबसे प्रीतिपूर्वक , पूर्ण सात्विकता के साथ दिव्य आत्म सम्बंध व ब्रह्मसम्बंध में जीना । 

• सदा योग चेतना , उच्च चेतना , दिव्य चेतना , आत्म चेतना , ऋषि चेतना , गुरु चेतना , शास्त्र एवं वेद चेतना में ही जीना । एक बार भी सामान्य या निम्न चेतना में नहीं जीना । 

• प्रतिपल स्मरण रखना कि मैं ऋषियों का आदर्श उत्तराधिकारी हूँ । मैं ऋषि पुत्र – पुत्री हूँ । अतः ऋषिवंश की वृद्धि , रक्षा , सेवा व इस हेतु अपने सर्वस्व की आहुति ही मेरा एकमात्र ध्येय है ।

 • जीवन व जगत् के अनन्त घटक या पहलू हैं । हर एक कार्य सेवा या साधन की विशिष्ट उपयोगिता या महिमा है किन्हीं भी अन्य सामाजिक , आर्थिक , राजनैतिक आदि कार्यों या उपलब्धियों से तुलना करके कभी भी स्वयं का अवमूल्यांकन नहीं करना ,अपितु अपने साधन , साध्य , अपने कार्य को सर्वोपरि महत्त्व देना । 

• अपने ज्ञान , संवेदना व सामर्थ्य का पूर्ण प्रयोग कर अनन्त गुणा स्वयं के लिए व समष्टि के लिए उपयोगी होना ।

 • बलिष्ठ शरीर , भावपूर्ण हृदय व धारणावती मेधा का पूर्ण समन्वित विकास कर सभी मनुष्यों में देवत्व व इस धरा पर दिव्यता की पूर्ण प्रतिष्ठा ही हमारा ध्येय है ।

• अपरिग्रह , तप , त्याग , सादगी , न्यूनतम आवश्यकताओं में जीना श्रेष्ठ जीवन का आदर्श है । 

. अपने कुलवंश के साथ – साथ ऋषियों के कुलवंश अपने पूर्वजों के तप , त्याग , आदर्शो , देश , धर्म , संस्कृति व पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए अपना प्रत्येक कर्म करना हमारा आदर्श है ।

. सफलता हेतु ध्येय के प्रति पूर्ण समर्पण , सामुहिक श्रम व श्रेय की भावना , पूर्ण उत्साह , क्षमाशीलता , निरभिमानिता पूर्वक स्वाभिमान का भाव , विनयशीलता , जितेन्द्रियता , एकनिष्ठा , कृतज्ञता , त्याग , दया , दानशीलता , सरलता , सात्विकता , निर्भयता , भगवान की कर्मफल व्यवस्था एवं न्याय व्यवस्था या भगवान् के विधान में पूर्ण श्रद्धा रखना हमारे जीवन का आदर्श है ।

• कृतज्ञता व करुणा दिव्य जीवन के दो आधार हैं । इन आधारों को मजबूत कर अपने जीवन , स्वाभिमान को सुदृढ़ बनाना हमारा आदर्श है।

 • भगवान् द्वारा दिए गए अनन्त ज्ञान और असीम प्रेम एवं अपरिमित सामर्थ्य को कृतज्ञतापूर्वक अनुभव करते हुए सदा पूर्ण सुख , शांति , समृद्धि एवं पूर्ण संतुष्टि का जीवन जीना आदर्श जीवन हैं।


Divya Jeevan  - जीवन को दिव्य कैसे बनाये , दिव्य जीवन के आदर्श , दिव्य जीवन की साधना
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दिव्य जीवन के नियम – 

 -वेद , शास्त्र , श्रेष्ठ गुरु एवं स्वधर्मपूर्वक विधि निषेध का 100 प्रतिशत श्रद्धा से पालन करना दिव्य जीवन का एक श्रेष्ठ संकल्प हैं 

 – एक क्षण के लिए भी स्वयं का या किसी अन्य का किसी भी प्रकार का अहित चिंतन नहीं करना , पूर्ण सात्त्विक जीवन जीते हुए एक श्रेष्ठ दिव्य आचरण करते हुए , जितना हो सके मैत्री , करुणा , मुदिता का आश्रय एवं अपुण्य की उपेक्षा करते हुए समष्टि का हित करना ।

 – इच्छा न होने पर भी योग एवं कर्मयोग या स्वधर्म का अनुष्ठान अवश्य करना तथा इच्छा होने पर भी स्वधर्म के विपरीत आचरण नही करना।

– एक क्षण लिए भी अशुभ विचार , अशुभ भाव संवेदना व अशुभ कर्म , वाणी , व्यवहार व स्वभाव का स्वागत नहीं करना नहीं करना , तथा एक क्षण के लिए भी शुभ से सत्य , धर्म या अपने साधन से विमुख नहीं होना तथा उसका अनादर नहीं करना ।

– श्रद्धां भगस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि ।

 जीवन में भगवद् समर्पण , गुरुभक्ति व आत्मसमर्पण 100 प्रतिशत अनिवार्य है । ज्ञान व पुरुषार्थ अपने प्रारब्ध व सामर्थ्य के अनुसार न्यूनाधिक हो सकता है , परंतु श्रद्धा या निष्ठा तत्त्व में न्यूनता अध्यात्म मार्ग पर स्वीकार्य नहीं है ।

  -एक बार भी अशुभ में प्रवृत्ति न हो , यह प्रथम कोटि का जीवन , अशुभ में पुनरावृत्ति न हो , यह मध्यम जीवन व अशुभ की पुनः पुनः प्रवृत्ति को सामान्य निम्न जीवन मानते हैं । अतः अत्यंत पुरुषार्थ व विवेक वैराग्य पूर्वक प्रतिपक्ष भावना व पूर्ण श्रद्धा से अशुभ से स्वयं को बचाकर रखना और प्रथम कोटि का जीवन जीना , सात्विक को स्वभाव बनाना एक श्रेष्ठ व्रत है । 

 -सभी प्रकार के भेदभाव , अज्ञान , अंधविश्वास , पाखंड , आडम्बर , कुरीतियों , कुप्रथाओं एवं दुराग्रह से मुक्त होकर भगवान् के वेदविधान , देश के संविधान व वैश्विक विधान ( यूनिवर्सल लो ) का एक बार भी अतिक्रमण नहीं करना ।

 – यम – नियमों के विपरीत आचरण , आहार , विचार , वाणी , व्यवहार व स्वभाव के स्तर पर स्थूल दोषों को नहीं करना ।

 – अज्ञान , अश्रद्धा व अकर्मण्यता के भाव रूप जो सूक्ष्म दोष हैं , उनसे दूर रहने के लिए सदा प्रयत्नशील रहना ।

 . अज्ञान जनित दुर्विचार , दुर्भावना व दुष्कर्म में एक बार भी प्रवृत्त नहीं होना । कर्म बन्धन का कारण है , इस भ्रान्ति से सर्वथा मुक्त होकर अकर्मण्यता या प्रमाद रूप मृत्युपाशों में असुरत्व का जीवन नहीं जीना तथा शुभ कर्म करते हुए निष्काम कर्म या दिव्य कर्म के मार्ग पर क्रमशः आगे बढ़ना ।

 . त्याग के नाम पर दरिद्रता का महिमामंडन ‘ मैं केवल आत्मा हूँ के नाम पर वीरता व पराक्रमादि का त्याग , अदृष्ट सत्यों के नाम पर भय , मुक्ति के नाम पर मिथ्या लोकों की कल्पना तथा अध्यात्म के नाम पर अंधविश्वासों में नहीं पड़ना ।

 – अपने ज्ञान , संवेदना , पुरुषार्थ , पराक्रम एवं उद्योग से अहिंसक ऐश्वर्य या दैवी सम्पदा सात्विक समृद्धि को बढ़ाना तथा जो कुछ हम पाएँ , उसका अपने लिए न्यूनतम प्रयोग करके शेष समष्टि के सुख , स्वास्थ्य , समृद्धि , शांति एवं सामुहिक सेवा के लिए

 – जीवन में सबसे बड़ी भूमिका उचित निर्णयों की होती है । तुलनात्मक रूप से सब बातों का तथ्यों का मूल्यांकन करके सब प्रकार की शारीरिक , मानसिक , आत्मिक , वैयक्तिक , पारिवारिक , सामाजिक , आर्थिक , राजनैतिक एवं प्राकृतिक आदि लाभ व हानि आदि का विचार करके सही निर्णय करना । 

– अज्ञान , काम , क्रोध , लोभ , मोह , अहंकार , हठ , दुराग्रह , स्वार्थ प्रभाव , दबाव , सत्कार , तिरस्कार , जाति , पंथ , समुदाय या अन्य किसी भी आग्रह से मुक्त होकर निर्णय करना । 

-निर्णयों को परिणाम तक पहुँचाना , संख्या के आधार पर नहीं सत्य के आधार पर निर्णय लेना , सत्य निर्णयों को स्थिरता , समग्रता एवं निर्भयता से स्वयं के अन्तःकरण में अवतरित करना ।


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दिव्य जीवन की साधना 

. साध्य की प्राप्ति का एकमात्र उपाय साधन का अनुष्ठान , साध्य को जपते नहीं रहना , साधन के प्रति पूर्ण सचेतन रहना ही सत्य साधना है ।

 . अभ्युदय एवं निःश्रेयस की समग्रता ही हमारी संतुलित साधना है । 

 -श्रेष्ठ व दिव्य आचरण जीवन व व्यवहार का अन्तिम सत्य है।

 – सत्व में पूर्ण व निरन्तर प्रतिष्ठा ही गुणातीत , भावातीत , दिव्यकर्म की स्थिति या जीवन मुक्ति है ।

 – भगवान् के विश्वमय एवं विश्वातीत स्वरूप का ज्ञान , भाव एवं कर्म के स्तर पर अभ्यास करते हुए अपने कर्म व सेवा से भगवान् की पूजा आराधना करना ।

 – भगवान् एवं उनकी सम्पूर्ण रचना निर्दोष है , दोष है अज्ञान एवं अज्ञानजनित दुर्विचार , दुर्भावना एवं दुष्कर्मों में । ज्ञान – अज्ञान दोनों ही अस्तित्व का स्वभाव है । शुभाशुभ , पाप – पुण्य , सत्व , रज , तम – ये अस्तित्व की रचना के अविभाज्य घटक हैं । जीवन की साधना इसी में है कि हम शुभ को बढ़ाएँ एवं अशुभ को घटाना , मिटाना व पराभूत करना ही दिव्य साधना है ।

 . अभी अभीप्सा में सच्चे और निष्कपट रहना , हमेशा अपने समर्पण में एकाग्र रहना , भगवान् की सहायता और उनके पथ – प्रदर्शन की उपस्थिति का अनुभव करना ही साधना है ।


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