success for youth – युवाओं के लिए सफलता के सूत्र || Sources of success for youth

 success for youth 

 युवाओं के लिए सफलता के सूत्र 

Sources of success for youth

      विजय, कामयाबी, सफलता, या जीवन में बड़ी उपलब्धि यह प्रत्येक ही युवक की सबसे बड़ी प्राथमिकता या मांग होती है, और इसी के इर्द-गिर्द उनके जीवन का पूरा ताना-बाना वो बुनता है। इस बार के संपादकीय में इस संदर्भ में कुछ बड़े बिंदुओं को क्रमशः  प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है।


Sources of success for youth
Success for youth

   1.  माता-पिता, परिजन एवं गुरु इस प्रकार से बच्चों की परवरिश करें, कि बच्चों, विद्यार्थियों या युवाओं में सुख, सफलता, विजय पाने की एक संतुलित समग्र स्थाई न्याय पूर्ण व आहिंसक दृष्टि व कीर्ति विकसित हो, केवल शरीर बल, केवल बुद्धि बल, केवल निष्ठा बल, केवल धन बल या केवल सम्मान आदि के पीछे युवा पागल होकर न दौड़े। अपितु शरीर को पूर्ण बलिष्ठ, पूर्ण स्वस्थ बनाकर अपने शरीर, इंद्रियों , मन, विचार, भावनाओं एवं ऊर्जा पर नियंत्रण रखते हुए सही दिशा में अपने सामर्थ्य का उपयोग करें। किसी भी एक या एक से अधिक विषयों में ज्ञान वह कुशलता की पराकाष्ठा अर्जित करें। 8 से 18 घंटे पुरुषार्थ की पराकाष्ठा में जीने का अभ्यास करें। लक्ष्य को प्राप्त किए बिना बीच में कार्य को नहीं छोड़े, क्योंकि अधिकांश लोग जो बड़ा कार्य करने का प्रथम तो साहस ही नहीं जुटा पाते हैं, कुछ लोग तो आरंभ तो कर देते हैं लेकिन बड़े कार्यो में चैलेंज प्रॉब्लम्स या बंधाए भी बड़ी ही होती हैं। उनका सामना करके हर चुनौती समस्या संकट, बंधाए या परिस्थितियों को कैसे सफलता या अवसर में बदलना है। यह विवेक , ज्ञान , कला, कुशलता, साहस, पराक्रम  व धैर्य युवाओं में नहीं होने से उनके सपने टूट जाते हैं तथा वे बड़े कार्य करने से वंचित रह जाते हैं।

आध्यात्मिक व्यक्ति , आध्यात्मिक विश्व का निर्माण करता हैं || A spiritual person creates a spiritual world.

   2.  अपने सामर्थ्य को समृद्धि में बदलने की कला में कुशलता, शारीरिक, बौद्धिक, भावनात्मक, कर्तव्य , नेतृत्व, वक्तृत्व, कविता, लेखन, अनुसंधान, अभिनय, संगीत कला, नृत्य, अनुवाद, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, फैशन, संवाद, साइंस आदि विविध समर्थय, मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, पॉलिटिक्स, मीडिया आदि के विशेष ज्ञान, विज्ञान व तकनीकी को वेल्थ ब्रांड , उद्योग तथा संगठन पार्टी, व्यापार , सर्विस या चैरिटी आदि में कैसे रूपांतरित करके समृद्धि, सफलता , उपलब्धि का विजय का नया इतिहास बनाने की होनी चाहिए। अपने व्यक्तित्व सामर्थ्य के साथ-साथ अपने कुल, वंश, परंपरा से प्राप्त सामर्थ्य, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, आध्यात्मिक व राजनीतिक, विश्वास, ऐश्वर्या, पूर्णिया को समृद्धि में बदलने की कुशलता होनी चाहिए। मिट्टी, जल, जंगल, जमीन, जड़ी-बूटी आदि जो भी अपने पास साधन है । उसे भी समृद्धि में परिवर्तित की कला कुशलता या योग्यता हो तो सफलता का नया कीर्तिमान बना सकते हैं।

     मिट्टी से मूर्ति, पात्र, खिलौने आदि। जल से भी जलीय खेती,  पेयजल आदि जमीन को वैज्ञानिक कृषि व डेयरी आदि के उद्योग लगाकर हम लीक से हटकर कुछ नया कर सकते हैं और लोग कर भी रहे हैं। नए बाजार, आधार व व्यापार बन रहे हैं।


     “केवल शरीर बल,  बुद्धि बल,  निष्ठा बल,  धन बल या सम्मान आदि के पीछे युवा पागल होकर न दौड़े अपितु शरीर को संपूर्ण बलिष्ठ, पूर्ण स्वास्थ्य बनाकर अपने शरीर, इंद्रिय, मन, विचार, भावनाओं एवं ऊर्जा पर नियंत्रण करते हुए सही दिशा में अपने सामर्थ्य का उपयोग करें””


  3.   प्रकृति यहां प्रारंभ से वरदान के रूप में प्राप्त सहज, सामर्थ्य को, सही आयु, सही समय पर पहचान कर उसको पूरा विकसित कर के किसी भी क्षेत्र, स्थान, देश में या सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक , शैक्षणिक आदि क्षेत्र में अथवा कृषि, पशुपालन, मधुमक्खी पालन व चिकित्सा आदि में जाने संभावना, आकाश, अवकाश या अवसर हो तो उसे खोजना, उसका  मूल्यांकन करके एक व्यवस्थित, व्यावसायिक योजना बनाकर उसे व्यवहारिक रूप से क्रियान्वित करें।

   4.  योग व कर्म योग, परस्पर सहयोग या उद्योग तथा सही लोगों की खोज करके उनको बड़े उद्देश्य के लिए साथ देने के लिए तैयार करना, व निरंतर उनके साथ में बने रहना, सामूहिक, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा व ध्येय निष्ठा के साथ बड़े कार्य की प्रतिष्ठा से ही बड़ी सफलता मिलती हैं।

  5.   या तो खुद किसी भी क्षेत्र में कोई बड़ा कार्य खड़ा करें या किसी बड़ी संस्था, संगठन, समाज या विराट महायज्ञ में आहुति देकर, जॉब , बिजनेस, पॉलिटिक्स या चैरिटी करके भी बड़े कार्य, बड़ी सेवा में बड़ा योगदान, बड़ी भूमिका या बड़ी सफलता अथवा उपलब्धि जीवन में हासिल कर सकते हैं ।

  6.   संसार में बहुत बड़े कार्य सेवा या अध्य की सिद्धि के लिए कुछ मूलभूत सिद्धांत हैं। उनका पूरी प्रमाणिकता से पालन करना, जैसे विधि या निषेध की मर्यादा की एक लक्ष्मण रेखा खींच कर रखना और कभी भी उसका अतिक्रमण नहीं करना, भगवान के विधान व देश के विधान, संविधान या कानून को एक बार भी नहीं तोड़ना। एक क्षण के लिए अशुभ विचारों, दोषों, दुर्लभता, आलस्य, प्रमाद, आत्मग्लानि, निराशा, नकारात्मकता, क्लेशओं का स्वागत नहीं करना। स्थूल दोष एक बार भी ना हो तथा सूक्ष्म दोष, मन, विचार, भाव या संस्कार के स्तर पर हो भी जाए तो उसकी पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए 24 घंटा प्रति पल जागरूक रहना।

  7.   दृष्टि व कृति में समग्रता, संतुलन, दूरदर्शिता, पारदर्शिता, न्याय, समानता, एकता, अहिंसा, सत्य एवं सात्विकता रखना। अज्ञान, अहंकार, विलासिता एवं लालच आदि में पडकर आत्मघाती विनाश को आमंत्रण नहीं देना। प्राथमिकताओं के निर्धारण, बड़े निर्णियो एवं आत्म मूल्यांकन में चूक नहीं करना। ब्रज से भी ज्यादा कठोर तथा फूल से भी अधिक कोमल रहकर महान पराक्रमी वह अति विनम्र होकर निरंतर सुधार, संशोधन, परिवर्तन, आंदोलन, सृजन व विस्तार करते रहना। संकट, चुनौती, संघर्ष एवं अत्यंत प्रतिकूल अवस्था में भी धैर्य नहीं खोना। आहार, विचार, वाणी, व्यवहार, स्वभाव व आचरण के प्रति पूर्ण जागरूक रहना। सदा उच्च चेतना में जीना। अपने सामने सदा महापुरुषों का प्रेरक आदर्श रखना। अपने मूल स्वरूप में रहकर अपने स्वकर्म, स्वधर्म, मानव धर्म, राष्ट्र धर्म, विश्व धर्म को प्रमाणिकता से निभाना


सास्वत प्रज्ञा से निश्चित शाश्वत सत्य , जीवन में निर्णय की भूमिका || The eternal truth determined by the eternal wisdom, the role of judgment in life

राष्ट्र और विश्व के कल्याण में एक संन्यासी की भूमिका ।। Role of a monk in the welfare of the nation and the world

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