नाड़ियाँ प्रकार एवं कार्य || Pulse types and functions

 

नाड़ियाँ : प्रकार एवं कार्य

 Pulse types and functions


     नाड़ी शब्द ‘ नाड ‘ शब्द से निकलता है जिसका अर्थ है ‘ तृण या वनस्पति का पोला , खोखला डंठल ‘ । नाड का शब्दार्थ ‘ ध्वनि ‘ या ‘ तरंग ‘ भी है । नाड़ी का मतलब शब्दकोश में लिखा है कि शरीर के अंदर माँस और तंतुओं से मिलकर बनी हुई बहुत सी नालियों में से कोई एक या हर एक जो हृदय से शुद्ध रक्त लेकर सब अंगों में पहुँचाती है । आधुनिक विज्ञान के ( नस ) रेशे ( फाइबर्स ) का एक समूह है जो शरीर के एक भाग से प्रणोदों तंत्रिका अनुसार ( एम्पल्सेस ) को लेकर दूसरे भाग में पहुँचाता है । प्रत्येक रेशा ( फाइबर ) एक तंत्रिका कोशिका ( नर्व सेल ) का तंत्रिकाक्ष ( एक्सॉन ) होता है । योग के अनुसार नाड़ी , धमनियाँ या नलिकाएँ वे हैं जो वायु , जल , रक्त और अन्य पोषक पदार्थों के साथ पूरे शरीर में आवागमन का काम करती हैं । प्राणायाम क्रियाओं में इन्हीं नाड़ियों का उपयोग किया जाता है ।

सार्धलक्षत्रयं नाड्यः सन्ति देहान्तरे नृणाम् ।

प्रधानभूता नाड्यस्तु तासु मुख्याश्चतुर्दश ।।
सुषुम्णेडा पिङ्गाला च गान्धारी हस्तिजिविका ।
कुहू सरस्वती पूषा शंखिनी च पयस्विनी ।।
वारूणालम्बुषा चैव विश्वोदरी यशस्विनी ।
एतासु तिस्त्रों मुख्या : स्युःपिङ्गालेडासुषुम्णिका ।।
                                                        ( शिव संहिता 2 / 13-15 )

     हमारे शरीर में 350000 नाड़ियाँ हैं ( परंतु 72,000 का उल्लेख सबसे ज़्यादा मिलता है । ) पर उनमें मुख्य रूप से चौदह हैं , जिनके नाम इस प्रकार हैं –

1. सुषुम्ना 2. इड़ा 3. पिंगला 4. गान्धारी 5. हस्तिजिव्हा   6. कुहू 7. सरस्वती 8. पूषा 9. शंखिनी 10. पयस्विनी 11. वारुणी 12. अलंबुषा 13. विश्वोदरा 14. यशस्विनी

इनमें भी विशेष रूप से 3 नाड़ियाँ प्रमुख हैं ।

1. इड़ा 2.पिंगला 3.सुषुम्ना

    नाड़ियाँ बहुत छोटी छोटी होती हैं और नाड़ी -चक्र समस्त तीनों शरीर – स्थल शरीर , सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर में परस्पर मिली हुई गुच्छिकाएँ होती हैं ।  वैज्ञानिक और चिकित्सक सूक्ष्म और कारण शरीर के अस्तित्व को नकारत रहे हैं । परंतु हमारे महान ज्ञानी ऋषि मुनियों ने इनको जाना , आत्मसात् किया और इनका विस्तृत विवेचन भी किया । वराहोपनिषद में लिखा है कि नाड़ियाँ शरीर में पैरों के तलवों से लेकर सिर के ऊर्ध्वभाग तक व्याप्त हैं । इनमें ही प्राण रहता है जो जीवन का श्वास है । उसी में आत्मा का निवास होता है जो शक्ति का आवास है और चेतन तथा पुद्गल जगत का निर्माता है ।

    अन्य शास्त्रों के अनुसार हमारे शरीर में 72,000 नाड़ियाँ होती हैं , जिनका उद्गम स्थल गुदा और जननेन्द्रिय के ठीक 12 अंगुल ऊपर तथा नाभि के ठीक नीचे है , जिसे कंद कहते हैं । अधिकतर योगियों ने इसका उद्गम स्थान नाभि के नीचे ही माना है परंतु कुछ नाड़ियों के अंतिम स्थान में मतभेद भी है । कठोपनिषद् और प्रश्नोपनिषद् के अनुसार नाड़ियों का उद्गम स्थान हृदय स्थली है जो सैकड़ों नाड़ियों का वितरण स्थान है ।



नाड़ियाँ  प्रकार एवं कार्य
नाड़ियाँ  प्रकार एवं कार्य 


14 प्रमुख नाड़ियों का विवरण इस प्रकार है
:

    दिए हुए चित्र से नाड़ियों की स्थिति स्पष्ट है । सुषुम्ना कन्द के बीच में मेरुदण्ड के साथ मस्तक तक जाती है । उसके दाएँ भाग में पिंगला व बाएँ भाग में इड़ा है । इड़ा में चंद्र व पिंगला में सूर्य तत्व विचरण करते हैं । सरस्वती व कुहू स्थित नाड़ियाँ सुषुम्ना के क्रमशः पीछे व आगे रहती हैं । गान्धारी व हस्तिजिव्हा इड़ा के पीछे व आगे स्थित रहती हैं । पूषा व यशस्विनी पिंगला के पीछे व आगे हैं । कहू व हस्तिजिव्हा के बीच में विश्वोदरा तथा यशस्विनी स्थित हैं । यशस्विनी व कुहू के बीच में वारुणी स्थित है । पूषा व सरस्वती के बीच पयस्विनी तथा गान्धारी व सरस्वती के बीच शांखिनी स्थित है । अलंबुषा कंदमध्य के नीचे स्थित है ।

    योग व आयुर्वेद के अनुसार सूक्ष्म शरीर का अंग होने के चलते नाड़ियाँ , प्राण प्रवाह तथा उसके नियंत्रण में व रोगों के उपचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका  
अलंबुषा नाड़ी : मूलाधार चक्र , गुदा , अपान वायु तथा उत्सर्जन तंत्र से सम्बंध रखती है ।

कुहू नाड़ी : स्वाधिष्ठान चक्र , जननांग व मूत्र नलिका तथा अपान वायु से सम्बंध रखती है ।

विश्वोदरा नाड़ी : मणिपूरक चक्र , पाचन तंत्र , समान वायु से सम्बंध रखती है ।

वारुणी नाड़ी : अनाहत चक्र , श्वसन तंत्र तथा उदान वायु से सम्बंध रखती है ।

सरस्वती नाड़ी : विशुद्धि चक्र , श्वसन तंत्र तथा उदान वायु से सम्बंध रखती है ।

सुषुम्ना नाड़ी : इस नाड़ी का सम्बंध सहस्रार चक्र , मस्तिष्क व प्राणवायु से होता है ।

इड़ा नाड़ी : शरीर व नासिका के बाएँ भाग व मन से सम्बंध रखती है जबकि पिंगला नाड़ी शरीर व नासिका के दाएँ भाग व प्राण से सम्बंध रखती है । दोनों ही नाड़ियाँ तृतीय नेत्र से सम्बंधित हैं । नाड़ी शोधन , सूर्यभेदन , चंद्रभेदन , अनुलोम – विलोम इत्यादि प्राणायामों व शरीर की ठंडी व गर्म प्रकृति को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है ।

     शंखिनी बाएँ कान से पयस्विनी दाएँ कान से तथा गान्धारी बाईं आँख से व पूषा दाईं आँख से सम्बंध रखती है । यशस्विनी दाएँ हाथ व पैर तथा उनके अंगूठों से गुज़रती है । हस्तिजिव्हा दाएँ हाथ , पैर तथा अंगूठों से गुज़रती है ।
      नाड़ियों में प्राण प्रवाह के असंतुलन से रोग उपजते हैं । उनसे सम्बंधित अंगों व द्वारों की मालिश व सिकाई से रोगों का उपचार किया जाता है ।
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