आओ जाने, प्राचीन भारत के वैज्ञानिक ऋषियों को || Come know, the scientific sages of ancient India

 आओ जाने, प्राचीन भारत के वैज्ञानिक ऋषियों को

Come know, the scientific sages of ancient India


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     आचार्य भारद्वाज ( विमान विज्ञान के पिता ) :-
    Acharya Bharadwaj (Father of Aeronautics):-

        आचार्य भारद्वाज के पिता महर्षियों के श्रेष्ठ आचार्य बृहस्पति के पुत्र थे उनकी माता का नाम ममता था आचार्य बृहस्पति को देवताओं का गुरू पुराण में अलग – अलग कथायें प्रचलित हैं । ये भी कहा जाता है कि महाभारत थाना गया है आचार्य भारद्वाज के जन्म के सम्बन्ध में मत्स्य पुराण भागवत में वर्णित कौरव – पाण्डव के गुरू आचार्य द्रोण के पिता आचार्य भारद्वाज ही थे । रामायण में भारद्वाज ऋषि का वर्णन आया है । विद्वानों का मत है कि अलग – अलग समय में अलग – अलग भारद्वाज नाम के आचार्य हुए हैं अर्थात भारद्वाज एक उपाधि का नाम है । 

         जिन भारद्वाज ऋषि का हम उल्लेख कर रहे हैं वे भारद्वाज ऋषि बाल्मिकी के शिष्य थे , यमुना और सरस्वती के संगम तीर्थ राज प्रयाग में भारद्वाज आश्रम था । वन गमन के समय श्रीराम ने सीता जी और लक्ष्मण के साथ कुछ समय इस आश्रम निवास किया था इन्होनें ही उन्हें चित्रकुट जाने का मार्ग भी बतलाया था । उनका ग्रंथ यन्त्र सर्वस्व आकाश शास्त्र तथा वैमानिक कला से सम्बन्धित है ये आयुर्वेद के भी ज्ञाता थे । 


    महर्षि चरक ( औषधि विज्ञान के पिता ) :-
    Maharishi Charak (Father of Medicine) :-

        चरक महान आयुर्वेदाचार्य थे उनका जन्म ईo से 200 वर्ष बाद अर्थात लगभग 257 विक्रम संवत के आस – पास हुआ । ये शल्य क्रिया के जनक सुश्रुत तथा व्याकरणाचार्य पतंजलि से पूर्व हुए थे । उनकी प्रसिद्ध पुस्तक चरक संहिता है चरक संहिता के आठ खण्ड है- 1. सूत्र स्थान , 2 . निदान स्थान , 3. विमान स्थान , 4. शरीर स्थान , 5. इन्द्रिय स्थान , 6 . चिकित्सा स्थान , 7. कल्प स्थान , 8. सिद्धि स्थान । चरक संहिता का अनुवाद अरबी व यूरोपिय भाषा में किया गया है , अनेक विद्वानों ने इस ग्रन्थ पर टीकायें भी लिखी है । 



    भास्कराचार्य Bhaskaracharya :-

        भास्कराचार्य का जन्म विक्रम संवत 1171 ई 0 में हुआ था उनका जन्म महाराष्ट्र प्रान्त में हुआ था भास्कराचार्य के पिता का नाम महेश्वर था वे गणित के प्रकाण्ड पंडित थे गुरूत्वाकर्षण का सिद्धान्त भास्कराचार्य ने ही दिया था । जिसका श्रेय आज न्यूटन को दिया जाता है जो कि गलत है   न्यूटन से 500 वर्ष पूर्व यह सिद्वान्त भास्कराचार्य जी दे चुके थे । भास्कराचार्य प्रमुख ग्रंथ है – सिद्वान्त सिरोमणी एवं सूर्य सिद्वान्त । सिद्वान्त सिरोमणी के की प्रसिद्वी एक महान गणितज्ञ एवं खगोल वैज्ञानिक के रूप में हुई । उनके चार भाग हैं- 1. लीलावती 2. बीजगणित , 3. गणिताध्याय , 4. गोलाध्याय । खगोल विज्ञान के क्षेत्र में उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ कर्ण कुतुहल है भारत सरकार ने भास्कराचार्य जी के नाम पर एक अपने उपग्रह का नाम भास्कर रखा । विक्रम संवत 1236 ई 0 में भास्कराचार्य जी का स्वर्गवास हुआ । 


    कपिल मुनि ( भौतिक विज्ञान के पिता ) :-
    Kapil Muni (Father of Physics) :-

         इनका जन्म आज से 5000 वर्ष पूर्व हुआ था । कपिल मुनि सगेकर्धमा ( ऋषि कर्दम ) और देवहुती के पुत्र थे , वो एक सिद्ध तपस्वी पुरूष थे । वह भारतीय दर्शन के सांख्य स्कूल के प्रतिपादक के रूप में सम्मानित हैं । सांख्य प्रवचन सूतरा और षष्टितन्त्र तन्त्र उनके मूल्यवान कार्य हैं जो दर्शन अनेकता के सिद्धान्त की वकालत करते थे । यह दर्शन चेतन पुरूष और प्रकृति , के साथ सत्व , रजस् और तमस् जो इसके तत्व है , की सत्ता की वकालत करता है । कपिल मुनि को भौतिक विज्ञान का महान वैज्ञानिक कहा जाता है । उनके प्रमुख शिष्य का नाम आसूरि था आचार्य आसूरि के शिष्य पंचशिख हुए पंचशिख के शिष्य जैगीश्रव्य हुए इन आचार्यों ने कपिल मुनि द्वारा लिखित सांख्य दर्शन का प्रचार प्रसार किया । कपिल मुनि के मूल ग्रंथ का नाम षष्टितन्त्र तन्त्र था । इन्होनें ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति पर निष्क्रिय ऊर्जा की अवधारणा को स्पष्ट किया । इनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों को आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी मान्यता प्रदान की है । आधुनिक वैज्ञानिक उन्हें ब्रह्माण्ड की सृष्टि विकास ( Father of Universe Evolution ) मानते हैं । 


    आर्यभट्ट Aryabhata

        आर्यभट्ट का जन्म विक्रम संवत 533 में पाटलीपुत्र ( आज का पटना शहर ) के निकट कुसुमपुर नामक ग्राम में हुआ था । आर्यभट्ट , एक महान विद्वान और खगोल विज्ञान ( ज्योतिष ) के अध्यापक , अपने समय के बहुत सम्मानित व्यक्ति थे उन्होनें आर्यभट्टीय लिखा , यह ग्रन्थ छन्दों में लिखा गया है जो कि चार खण्डों में विभाजित है । वह भी इस सिद्धान्त के प्रतिपादक थे कि पृथ्वी , सूर्य के चारों और घूमती है । आर्यभट्ट त्रिकोमिती तथा पाई के भी आविष्कर्ता थे ।


    धनवन्तरी ( प्राचीन टीकाकरण / मैडिकल सांइस के पिता ) :-
    Dhanvantari (Father of Ancient Vaccination / Medical Science) :-

        धनवन्तरी , औषधि के भगवान है । धनवन्तरी का द्वापर युग में धन्वा , काशी के राजा के पुत्र के रूप में जन्म हुआ । महान आयुर्वेदाचार्यो में धनवन्तरी सबसे पहले हुए । धनवन्तरी के शिष्यों के माध्यम से आयुर्वेद की परम्परा आगे बढ़ी । आज से 30-40 वर्ष पूर्व तक हाथ में लगने वाले नस्तर ( चेचक टीका ) के आविष्कर्ता भी धनवन्तरी थे । 


    विश्वकर्मा ( शिल्प विज्ञान के पिता ) :-
    Vishwakarma (Father of Craft Science) :-

        विश्वकर्मा निःसन्देह देवलोक के नगरों के सबसे पहले शिल्पकार और कारीगर हैं । वह भगवान विष्णु के सुदर्शनचक्र , भगवान शिव के त्रिशुल , और इन्द्र के वज को बनाने वाला हैं । वह प्रभासा विष्णु का पौत्र और महासती योगसिद्ध के पुत्र थे , उसके दो पुत्र विश्वरूप , और व्रजा थे । उन्होनें अपने पिता का अनुसरण किया । हिन्दू कारीगर विश्वकर्मा जयन्ती मनाते हैं ।


     नागार्जुन ( रसायन विज्ञान के पिता ) :-
    Nagarjuna (Father of Chemistry) :-

       ये प्रसिद्ध दर्शनशास्त्री , रसायनशास्त्री थे । इनका जन्म विदर्भ ( मध्य प्रदेश के जिला रायपुर के ग्राम बालका ) में दूसरी सदी में हुआ था । बहुत से भस्म बनाने की विधि इन्होनें तैयार की । तांबे से सोना कैसा बनता है इसका वर्णन – विधि भी नागार्जुन ने रस हृदय में बताई है । वो एक आयुर्वेदाचार्य भी थे , उन्होनें आरोग्य मंजरी , कक्षतन्त्र , योगसार , योगाष्टक ग्रन्थ लिखे ।


    महर्षि सुश्रुत ( शल्य चिकित्सा के पिता ) :-
    Maharishi Sushruta (Father of Surgery) :-

         सुश्रुत जी प्राचीन भारत के प्रसिद्ध सर्जन वैद्य थे । उन्होनें प्लास्टिक सर्जरी की प्रौद्योगिकी की विधि संसार को दी । सुश्रुत को सर्जरी का पिता कहा जाता है । सुश्रुत संहिता उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है जो आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में विभिन्न सर्जन के यन्त्र प्रयोग किये जाते हैं , उनमें से 124 प्रकार के यन्त्र सुश्रुत जी ने ही विकसित किये थे । 


    वराहमिहिर varahamihira :-

         इस वैज्ञानिक का काल राजा विक्रमादित्य के काल का है । वराहमिहिर प्रसिद्ध खगोलविद थे । उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ वृहदसंहिता ‘ है । यह माना जाता है कि ये उज्जैन नगरी में रहते थे तथा राजा विक्रमादित्य के 9 रत्नों में से एक थे । उनका प्रमुख ग्रन्थ पंच सिद्वान्त है । इसके अलावा प्रमुख ग्रन्थ है वृहद जातक तथा वृहत्संहिता । इन ग्रन्थों में भौतिक उनके भूगोल नक्षत्र विद्या , वनस्पति विज्ञान , प्राणी शास्त्र के साथ – साथ तत्कालीन सामाजिक , राजनैतिक परिस्थितियों का भी वर्णन है इन ग्रन्थों में हमें प्राचीन भारतीयों की वैज्ञानिक खोजों का भी ज्ञान प्राप्त होता है । 


    महर्षि अगस्त्य ( प्राचीन वैद्युत अपघटय / बैटरी के पिता ) :-
    Maharishi Agastya (father of ancient electrolytic / battery):-

         महर्षि अगस्त्य एक वैदिक ऋषि थे । इन्हें सप्तर्षियों में से एक माना जाता है । ये वशिष्ठ मुनि ( राजा दशरथ के राजकुल गुरू ) के बड़े भाई थे । वेदों से लेकर पुराणों में इनकी महानता की अनेक बार चर्चा की गई है । इन्होनें अगस्त्य संहिता नामक ग्रन्थ की रचना की जिसमें इन्होनें हर प्रकार का ज्ञान समाहित किया । इन्हें त्रेता युग भगवान श्री राम से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ उस समय श्री राम वनवास काल में थे । इसका विस्तृत वर्णन श्री बाल्मीकि कृत रामायण में मिलता है । इनका आश्रम आज भी महाराष्ट्र के नासिक की एक पहाड़ी पर स्थित है । उनके ग्रन्थ अगस्तसंहिता में वैद्युत अपघटन , विद्युत , बैटरी बनाने का विस्तार से वर्णन है । अतः बैटरी बनाने का श्रेय डेनियल को पिता के रूप में जाता है तो महर्षि अगस्त्य को पितामह के रूप जाना चाहिए ।


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