मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम || Maryada Purushottam Shri Ram in Hindi

 मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम 


 Maryada Purushottam Shri Ram in Hindi


राम मिलेंगे मर्यादा से जीने में , 

राम मिलेंगे हनुमान के सीने में ।। 

Maryada Purushottam Shri Ram in Hindi
भगवान श्री रामचन्द्र


      मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जिनकी चर्चा के बगैर भारतीय संस्कृति व भारतीय धर्म का इतिहास अधूरा रह जायेगा । तपस्वी वाल्मीकि मुनि ने तप और स्वाध्याय में लगे हुए नारद मुनि से पूछा इस समय संसार में धर्मज्ञ , सत्यवक्ता और अपने व्रतों में दृढ़ पुरुष कौन है जो सदाचार से युक्त , सब प्राणियों के कल्याण में तत्पर रहता है तथा तप , दया आदि गुणों से युक्त है ? क्रोध जिनसे कोसों दूर है वह महापुरुष कौन है ? बाल्मीकि मुनि के प्रश्न का उत्तर देते हुए नारद मुनि ने कहा- कि अयोध्या मे रघुकुल वंश में उत्पन्न ” राम ” है । 

     श्रीराम दशरथ महाराज के पुत्र थे । इनकी माता का नाम कौशल्या था । जब राम 5 वर्ष के हुए तब यज्ञोपवीत संस्कार के साथ वेदारंभ एवं शिक्षा ग्रहण शुरु हुआ । राम के अलावा , भरत , शत्रुघ्न तथा लक्ष्मण का संस्कार भी वैदिक पद्धति से हुआ और चारों भाई विश्वामित्र के आश्रम में रहकर ब्रह्मचर्य की साधना करने लगे । शिक्षा की पूर्णता के बाद जनक पुत्री सीता से राम का विवाह हुआ । आदि कवि वाल्मीकि ने रामायण में लिखा है कि राम और सीता की उम्र विवाह के समय 25 एवं 18 वर्ष की थी । वे सांगोपांग वेद अध्ययन करके तथा यथाविधि व्रत करके स्नातक हुए थे । इसलिए वे तत्वत : चारों वेदों के ज्ञाता थे । धनुर्विद्या में अपने पिता दशरथ से भी आगे थे । उनकी विलक्षण स्मृति और अद्भुत प्रतिभा थी । 


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     शिक्षा समाप्ति व विवाह के पश्चात श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी शुरू हो गई । परन्तु मन्थरा के बहकावे में आकर कैकयी ने इसका विरोध किया और कहा कि अयोध्या का राजा मेरा लाडला भरत बनेगा । नहीं तो हलाहल ( विष ) पीकर अपनी जान दे दूंगी । इस बात को सुनकर दशरथ बेहोश होकर गिर पड़े । ऐसी हालत को देखकर श्रीराम ने कारण पूछा तो पता चला कि बात कुछ और है ।

     यह सुनकर श्रीराम कैकयी मां के चरण छूकर कहते हैं मां , तुम पहले ही बता देती । मुझे राजा बनने की बिल्कुल लिप्सा नहीं है । कैकयी के आदेश पर वे स्वयं 14 वर्ष के वनवास के लिए जंगल में चल पड़े । यह एक अनोखी घटना थी ।

     माता कौशल्या व अयोध्या वासी सभी ने राम को समझाया परन्तु राम अपने वचन पर अटल रहे । कहा जाता है कि जब राम वन की ओर प्रस्थान करने लगे तब सारी अयोध्या उनके साथ चल पड़ी । हर्ष और शोक में , सुख और दुख में , मान और अपमान में , लाभ और हानि में एक समान रहना यह महापुरुषों का लक्षण होता है । जो अपनी पराकाष्ठा के साथ श्रीराम के जीवन में दृष्टिगोचर होता हैं।

     राम के साथ सीता और लक्ष्मण भी वनवास गये । राम लाख मनाने पर भी सीता नहीं मानी । राम ने कहा जंगल में स्त्री का रहना खतरे से खाली नहीं है । परन्तु सीता ने इसे स्वीकार नहीं किया । उन्होंने कहा कि पति का अनुकरण करना ही नारी का सबसे बड़ा धर्म है । 

     ऐसा रामायण में वर्णन आता है कि कैकयी पुत्र भरत ने राम को ही राजा स्वीकार करके उनके पादुका सिंहासन पर रख दिये थे और खुद कभी भी राजसिंहासन पर नहीं बैठे कैसा स्नेह था उनका ? कितनी ऊंची संस्कृति थी हमारी ? भारत के अतिरिक्त यह उच्च आदर्श दुनियां में कहीं देखने को नहीं मिलेगा । यदि आज भी ऐसे भाई हो जाएं तो सारे जहां से भाई – भाई के झगडे देखने सुनने को न मिलें ।

      वनवास में ही राम को रावण की बहन शूर्पणखा मिली और उसने राम के साथ विवाह करने का प्रस्ताव रखा , जिस पर राम ने पति के धर्म का पालन करते हुए अपनी मर्यादा का पालन किया । इस घटना को शूर्पनखा ने अपना अपमान समझा और लंकापुरी में जाकर अपने भाई रावण को सीता के अपहरण के लिए तैयार किया रावण ने छल से साधु का वेश धारण कर सीता माता का वन से अपहरण कर लिया। राम सीता की खोज में लगे थे । इसी दौरान वानरराज सुग्रीव से मैत्री हुई । सुग्रीव भी अपने भाई बाली से परेशान था । सुग्रीव ने राम से मदद मांगी । राम ने अपनी मर्यादा का पालन करते हुए दुराचारी बाली को मारा क्योंकि उसने सुग्रीव की पत्नी को जबरन दासी बनाकर रखा था व उसके साथ दुराचार भी करता था ।

     राम और रावण का युद्ध हुआ । धर्म और सत्य की विजय हुई । ज्ञानी होने पर भी चरित्र से गिरा हुआ व्यक्ति विनाश को प्राप्त होता है ।

     श्रीराम एक अच्छे शिष्य , आदर्श पुत्र , कुशल पति , आदर्श मित्र , आर्दश स्वामी , गौरवशाली योद्धा , आदर्श धर्मसंस्थापक , आर्दश शरणागत के रक्षक , आदर्श भाई , आदर्श शासक व महान मर्यादाओं के पालक एक आदर्श महापुरुष थे ।


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