महाशिवरात्रि पर विशेष- वेद, उपनिषदों में शिव || Mahashivratri special in Hindi

 महाशिवरात्रि पर विशेष 
 Mahashivratri special

     दोस्तों महाशिवरात्रि के पर्व पर आज हम आपको बताएंगे महाशिवरात्रि के बारे में तथा आदि योगी भगवान शिव के बारे में तथा आदियोगी भगवान शिव को वेद, योग दर्शन आदि शास्त्रों में भगवान शिव के बारे में क्या बताया गया है, तो आइए पढ़ते हैं आज का यह आर्टिकल-

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     देवों के देव महादेव ही एक ऐसे भगवान हैं इनकी भक्ति हर कोई करता है। वह इंसान हो हो तो राक्षसों प्रेत हो अथवा देवता ही क्यों ना हो यहां तक कि पशु पक्षी नभचर पाताल लोक वासी जलचर अथवा वैकुंठ वासी हो सभी शिव की भक्ति करते हैं। शिव की भक्ति हर जहां पर हुई है और जब तक यह दुनिया रहेगी तब तक शिव की महिमा गाती जाती रहेगी।

महाशिवरात्रि  Mahashivratri –

     महाशिवरात्रि एक प्रमुख त्योहार हैं, भगवान शिव का यह एक प्रमुख पर्व है। सावन शिवरात्रि  सावन के महीने में सबसे शुभ दिनों में से एक होती है। इस दिन, भक्तगण एक दिन का उपवास रखकर समृद्ध और शांतिपूर्ण जीवन के लिए भगवान शिव और देवी माता पार्वती की पूजा करते हैं। 

 

कौन है शिव? What is Shiva?-

     शिव शब्द एक संस्कृत भाषा का ही शब्द है, जिसका अर्थ है कल्याणकारी , शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शान्ति भी बताया गया है। ‘शि’ का मतलब है पापों का नाश करने वाला तथा ‘ व’ का अर्थ होता है देने वाला दाता।

शिवलिंग क्या है? What is Shivling?

     शिव की दो काया है एक तो वह जो सूक्ष्म रूप से व्यक्त है, दूसरी वह जो सूक्ष्म रूप  अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। कहां सबसे ज्यादा पूजन लिंग रूपी पत्थर में किया जाता है। बहुत से लोगों के मन में लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम उत्पन्न रहता है, लिंग का संस्कृत का अर्थ है चिन्ह,  इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए प्रयोग किया जाता है। शिवलिंग का अर्थ होता है कि शिव अर्थात परम पुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिन्ह।

 

Mahashivratri special in Hindi
shiva

 

वेदों में शिव Shiva in the Vedas :-

नमः शम्भवायच मयोभवाय च नम: शंकराय च 

मयस्कराय च नमः शिवायच शिवतराय च। (यजुर्वेद० १६/४१)

अर्थ-  मनुष्य को शुभ सुख प्राप्त कराने हारे परमेश्वर और सुख संपत्ति के विद्वान का भी सत्कार कल्याण करने वाला है और वह सब प्राणियों को सुख सुख पहुंचाने वाले का भी सत्कार तथा मंगलकारी और अत्यंत मंगल स्वरूप पुरुष का भी सत्कार करते हैं वे कल्याण को प्राप्त होते हैं।

 —  इस मंत्र में शंकर मैच कर शिव शिव पर संभव मयूर भाव आदि शब्द आए हैं जो सभी एक ही परमात्मा को प्रयुक्त हुए हैं।

वेदों में ईश्वर को उनके गुणों , कर्मों के आधार पर यह बताया है–
In the Vedas, God has been told on the basis of his qualities and deeds-

 

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।

                    -यजु० ३/६०

 अर्थ-    विविध ज्ञान भंडार तथा विदयात्री के आगार और सुरक्षित आत्मबल के वर्धक परमात्मा का यज करें । जिस प्रकार खरबूजे के पक जाने वह आप ही अपने डंठल से अलग हो जाता है , इसी प्रकार मनुष्य या हम सभी इस मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाएंगे, मोक्ष  न छूटे।

 

या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी।

 

तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि।।

 

                         -यजु० १६/२

 

अर्थ-  है मेघा सत्य का उपदेश देने से सुख पहुंचाने वाले तथा तथा दुष्टों को भय देने वाले तथा श्रेष्ठ के लिए शुभकारी शिक्षक ! जो आपकी घोर प उपद्रव से रहित सत्य धर्मों को प्रकाशित करने वाले कल्याणकारी  या विस्तृत उपदेश रूप नीति से अत्यंत सुख पाने वाली देह या विस्तृत उपदेश की नीति को हम लोगों को शीघ्र समझाने वाले शिक्षक हमें शिक्षा दीजिए

या ते रुद्र शिवा तनू: शिवा

 विश्वाहा भेषजी।

शिवा रुतस्य भेषजी 

तया नो मृड जीवसे।।

                     -यजुर्वेद १६/४९

अर्थ-  हे राजा के वैद्य तू और तेरी कल्याण करने वाली देह या नीति देखने में प्रिया और जो औषधियों के तुल्य रोग नाशक हैं और रोगी को सुखदाई पीड़ा हरने वाला है,  इसलिए हमें जीने के लिए सब दिन सुख कर।

 

उपनिषदों में भी शिव निम्न प्रकार से है-
Shiva is also mentioned in the Upanishads as follows-

 

सब्रह्मा सविष्णु: स रुद्रस्स: शिवस्सोऽक्षरस्स: परम:  स्वराट्।

स इन्द्रस्स: कालाग्निस्स चन्द्रमा:।।

                 -कैवल्यो० १/८

अर्थ-  वह जगत का निर्माता है, पालन करता है तथा दंड देने वाला है , और कल्याण करने वाला और विनाश को प्राप्त न होने वाला है तथा सर्वोपरि शासक ऐश्वर्या व काल का भी काल शांति तथा प्रकाश देने वाला है।

प्रपंचोपशमं शान्तं शिवमद्वैतम् 

चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः।।

     -माण्डूक्य०

अर्थ- पंचजागृत आदि अवस्थाएं जहां पर शांत हो जाती हैं और शांत आनंदमय  अतुलनीय चौथा तुरियापद  माना जाता है वह आत्मा है और जानने के योग्य है।

   यहां शिव को शांत तथा आनंद में माना गया है।

 

सर्वाननशिरोग्रीव: सर्वभूतगुहाशय:।

सर्वव्यापी स भगवान् तस्मात्सर्वगत: शिव:।।

                       -श्वेता० ४/१४

अर्थ-  जो इस संसार की उत्पत्ति हैं तथा स्थिति और प्रलय का करता है , जो सब प्राणियों के हृदयकाश में उपस्थित हैं, जो सर्व व्यापक तथा सुखी हैं, वही सुख रूप शिव आता सर्वत्र हैं।

 

योगदर्शन में परमात्मा को इस प्रकार बताया है-
In Yoga Darshana, God is described as follows-

 

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:।। १/१/२४

अर्थ-  जो अविद्यदी, कलेश, कुशल ,अकुशल, इष्ट, अनिष्ट और म मिश्र, फलदायक कर्मों की वासना से रहित है तथा वह सब जीवो में विशेष ईश्वर कहलाता है।

 

स एष पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात्।। १/१/२६

अर्थ-  वह जो प्राचीन गुफाओं का भी गुरु है, तथा उसमें भविष्य भूत तथा वर्तमान काल का कुछ भी संबंध नहीं रहता है। क्योंकि वह तो अजर – अमर तथा नित्य हैं।

 

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