योगीराज श्री कृष्ण के जीवन चरित्र पर महाभारत ओर महापुरुष || Life Character of Shri Krishna in Mahabharata.

 योगीराज श्री कृष्ण के जीवन चरित्र पर महाभारत ओर महापुरुष 
 Life Character of Shri Krishna in Mahabharata

 

लाला लाजपत जी राय ने अपनी पुस्तक ‘श्रीकृष्णचरित’ में योगीराज श्री कृष्ण के सम्बन्ध में एक बड़ी विचारणीय बात लिखी है-

    संसार में महापुरुषों पर उनके विरोधियों ने बहुत ही अत्याचार किए हैं । परंतु योगी श्री कृष्ण एक ऐसे महापुरुष हैं जिस पर उनके भक्तों ने बड़े लांछन लगाए हैं। श्री कृष्ण अपने भक्तों के अत्याचार के शिकार हुए हैं और हो भी रहे हैं। आज के समय में योगीराज श्री कृष्ण पर कितने ही लांछन लगे हुए हैं , जिसमें श्री कृष्ण को भागवत के आधार पर चोर – छलिया और न जाने कितने ही विभूषण से अलंकृत करके उनके पावन चरित्र को दूषित करने का प्रयास किया जा रहा है । 

     कहां तो महाभारत में शिशुपाल जैसा उनका प्रबल विरोधी , परंतु उनके चरित्र के संबंध में एक भी दोष नहीं निकाल सका और आज के समय में श्री कृष्ण भक्त जनों ने कोई भी ऐसा दोष नहीं छोड़ा है जिसे श्री कृष्ण के मत्थे न मला गया हो। क्या आप भी मानते हैं कि ऐसे दोषों वाले कृष्ण किसी भी जाति, समाज, राष्ट्र के आदर्श हो सकते हैं।

 

तो आइए जानते हैं भगवान श्रीकृष्ण के चरित्र को, धर्म संस्थापक श्री कृष्ण के चरित्र में कहीं भी कलंक नहीं है-

     योगीराज श्री कृष्ण एक महान विद्वान, संपूर्ण ऐश्वर्या के स्वामी तथा योगी थे । वेदांग के ज्ञाता थे। वेद ज्ञाता न होते तो वह विश्व प्रसिद्ध “गीता का उपदेश” नहीं देते।

    योगीराज श्री कृष्ण ने सिर्फ एक ही विवाह किया था। वह भी सिर्फ रुक्मणि से , तथा विवाह के पश्चात भी 12 वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते रहे, तत्पश्चात प्रद्युम्न नामक पुत्र रत्न प्राप्त हुआ था । ऐसे महायोगी महापुरुष को रासलीला नचाने वाले , छलिया तथा चूड़ी बेचने वाला और 16 लाख़ शादियां करने वाला आदि लांछन लगाया । इसमें मूर्खता के अतिरिक्त कुछ नहीं।

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 योगीराज भगवान श्री कृष्ण का नाम राधा के साथ जोड़ना उस महापुरुष के निष्पाप चरित्र पर कलंक लगाने जैसा है।

     संपूर्ण महाभारत में केवल कर्ण का पालन करने वाली राधा मां को छोड़कर इस काल्पनिक राधा का नाम कहीं नहीं मिलता है। भागवत पुराण में भी श्रीकृष्ण की बहुत सी लीलाओं का वर्णन हुआ है, लेकिन वहां पर राधा का कोई भी वर्णन नहीं है। सिर्फ राधा का वर्णन मुख्य रूप से ब्रह्मवैवर्त पुराण में ही मिलता है। देखा जाए तो यह ब्रह्मवैवर्त पुराण वास्तव में कामशास्त्र हैं, जिसमें योगीराज श्री कृष्ण और राधा आदि की आड़ में लेखक ने अपनी कामवासना को शांत किया है। यहां पर भी मुख्य बात यह है कि इस पुराण में श्री कृष्ण के राधा के साथ अलग-अलग संबंध दर्शाए गए हैं । जिससे स्वत ही यह सिद्ध करते है कि राधा काल्पनिक है।

     देखते हैं ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्म खंड के पांचवे अध्याय में इस लोक 25 ,26 के अनुसार इसमें राधा को श्रीकृष्ण की पुत्री सिद्ध किया गया है, क्योंकि वह श्री कृष्ण के वामपार्श्व से उत्पन्न हुई बताया गया है।

     अब देखते हैं तो हम ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खंड अध्याय 48 में राधा कृष्ण की पत्नी थी जिसका विवाह ब्रह्मा जी ने करवाया।

     और देखते हैं इसी ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड के अध्याय 49, के श्लोक 35, 36, 37, 40, 47 में राधा कृष्ण की मामी थी बताया गया है कि राधा का विवाह श्री कृष्ण की माता यशोदा के भाई रायण के साथ हुआ था। गोलोक में रायण कृष्ण का अंशभूत गोप था। अब देखा जाए तो गोलोक के रिश्ते से राधा श्री कृष्ण की पुत्रवधू हुई। अब आप ही सोचिए क्या ऐसे ग्रंथ और ऐसे व्यक्ति को प्रमाण मानना चाहिए या नहीं।

    हिंदी कवियों ने भी इन्हीं पुराणों के आधार बनाकर भक्ति के नाम पर शृंगारिक रचनाएं की है । दरअसल देखा जाए तो यह लोग महाभारत वाले योगीराज श्री कृष्ण तक तो पहुंच ही नहीं पाए।

    अब आप खुद ही सोचिए , जो पराई स्त्री तो दूर अपनी पत्नी से भी 12 साल की तपस्या के बाद केवल संतान प्राप्ति हेतु ही समागम करता है, जिसके हाथ में सिर्फ मुरली ही नहीं दुष्टों का विनाश करने के लिए सुदर्शन चक्र था तथा जिसे गीता में योगेश्वर कहा गया है। जिसे दुर्योधन ने भी पूज्यतमों लोके अर्थात संसार में सबसे अधिक पूजनीय कहां है। 

    जो पहर रात्रि शेष रहने पर ईश्वर की उपासना करता है, जो युद्ध और यात्रा में भी निश्चित रूप से संध्या करता था, जिसके गुण ,कर्म, स्वभाव और चरित्र को महर्षि दयानंद ने आप्तपुरुषों के सदृश बताया और बंकिम बाबू ने जिसे सर्वगुणान्ति और सर्वपाप रहित, आदर्श चरित्र बताया है। जो धर्मात्मा की रक्षा के लिए सत्य और धर्म की परिभाषा को बदल देता था। ऐसे धर्म रक्षक एवं दुष्टों का संहार करने वाले योगीराज श्री कृष्ण के अस्तित्व पर लांछन लगाना सबसे बड़ी मूर्खता ही है। और हम अब अपने महापुरुषों तथा उनके बलिदानों के चरित्र का हरण नहीं होने देंगे।

 

तो आइए, अब हम देखते हैं योगिराज श्री कृष्ण जी के विषय में महाभारत में क्या लिखा गया है-

महाभारत के उद्योगपर्व के 88/5 में –

दुर्योधन – मैं यह अच्छी प्रकार से जानता हूं कि तीनों लोकों में यदि इस समय कोई सर्वाधिक पूजनीय व्यक्ति है तो वह विशाल -लोचन योगिराज श्रीकृष्ण हैं।

महाभारत द्रोणपर्व 18 में धृतराष्ट्र –

योगीराज श्री कृष्ण कभी भी अपने यौवन में पराजित नहीं हुए। उनमें इतने विशिष्ट गुण हैं कि उनकी गणना कर पाना असंभव है।

महाभारत सभाo 38/18-20 में –

भीष्म पितामह- योगीराज श्री कृष्ण जी द्विजातीयों में ज्ञानवृद्ध तथा क्षत्रियों में सर्वाधिक बलशाली है। पूजा के यही 2 गुण होते हैं जो श्रीकृष्ण में विद्यमान हैं। योगीराज श्री कृष्ण वेद -वेदांग के पंडित तथा बल में सबसे अधिक बलशाली है । दान, दया, बुद्धि, शूरता, शालीनता, नम्रता, तेजस्विता, चतुराई, धैर्य तथा संतोष इन सभी गुणों में श्री कृष्ण से अधिक और कौन हो सकता है।

महाभारत उद्योगo अध्याय 83 में –

वेदव्यास – योगीराज श्री कृष्ण इस समय मनुष्य में सबसे बड़े धैर्यवान, धर्मात्मा तथा विद्वान हैं।

महाभारत वनपर्वo 12/36 में-

अर्जुन- हे मधुसूदन, आपके गुणों के कारण हि ‘दाशार्ह’ हैं। आपके स्वभाव में झूठ, क्रोध, मात्सर्य, निर्दयता एवं कठोरता आदि दोषों का अभाव है।

महाभारत शांतिपर्व 43 में –

    यदुवंशियों में सिंह के समान पराक्रमी श्री कृष्ण! यह पैतृक राज्य हमें वापस प्राप्त हो गया है । यह सब आपकी ही कृपा, अद्भुत राजनीति, अतुलनीय बुद्धि कौशल तथा पराक्रम का ही फल है । इसलिए शत्रुओं के संहार करने वाले कमलनयन श्री कृष्ण! आपको हम बार-बार नमस्कार करते हैं।

कृष्ण चरित्र में बंकिमचंद्र- 

    योगीराज श्री कृष्ण जैसा सर्वगुणान्वित और सब पापों से रहित, आदर्श चरित्र और कहीं ना तो है, और ना किसी देश के इतिहास में है, और ना ही किसी काल में हैं।

योगेश्वर कृष्ण में, पृष्ठ 352 –

चमूपति – हमारा अर्घ्य कुछ योगिराज श्री कृष्ण तो है जिसने युधिष्ठिर के अश्वमेध में अर्घ्य स्वीकार नहीं किया तथा फिर से साम्राज्य की स्थापना कर दी , परंतु उससे निर्लेप,निस्संग रहा है, और यही योगीराज श्रीकृष्ण का योग हैं। 

महर्षि दयानंद सरस्वती –

     योगीराज श्री कृष्ण का इतिहास महाभारत में अति उत्तम है। उनका गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश हैं, जिसमें कोई अधर्म का आचरण श्री कृष्ण जी ने जन्म से लेकर मरण-पर्यन्त तक कुछ भी बूरा काम नहीं किया, ना ही ऐसा लिखा है।

 

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